हिंदी के पहले जासूसी कथाकार – गोपाल राम गहमरी

जिन परिस्थितियों में हिंदी उपन्यास लेखन का प्रारंभ हुआ, वे परिस्थतियाँ यूरोप से भिन्न थी। यूरोप में आधुनिकता का आगमन औद्योगिक  क्रांति के साथ हुआ था, जो वहां की सभ्यता और समाज की ऐतिहासिक परिणति थी। औद्योगिक  क्रांति के बाद वहां “पुजारी, योद्धा और श्रमिकों के सामन्ती ढांचे में से ही एक मध्यम वर्ग का जन्म हुआ। सालों-साल तक यह वर्ग अपनी बढ़ती हुई शक्ति प्राप्त करता रहा था। सामंतवाद के विरुद्ध इसने एक लम्बे संग्राम का आरम्भ किया।” इस संग्राम के बाद आई पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था में व्यक्ति एवं व्यक्ति तथा समाज एवं व्यक्ति के सम्बन्ध सूत्र सरलता से जटिलता की ओर बढ़ने लगे। जीवन और समाज के बदले हुए स्वरुप की अभिव्यक्ति के लिए रचनाकारों ने ‘उपन्यास’ विधा की तलाश की। इस नई विधा का स्वागत यूरोप के मध्यम वर्ग ने गर्मजोशी से किया। यह मध्यम वर्ग बौद्धिक दृष्टि से जागरूक था और रचना पर अपनी सार्थक प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकता था। इस सन्दर्भ में जब हम १९ शताब्दी के दौर के उपन्यासों को देखते हैं तो स्पष्ट होता है कि भारत में आधुनिकता आयातित थी, औद्योगिक  क्रांति के कारण यहाँ के समाज में मौजूद नहीं थे, उस क्रांति के प्रभाव अवश्य यहाँ अंग्रेजों के साथ आये। यहाँ की समाज व्यवस्था में उस समय वह जटिलता भी नहीं थी, जिसकी अभिव्यक्ति के लिए यूरोप के रचनाकारों ने उपन्यास विधा की तलाश की थी। औद्योगिक सभ्यता के लाभों को भोगता हुआ भारत में जो मध्यम वर्ग उदित हो रहा था, उसमे बौद्धिक जागरूकता का अभाव था। वह अपने मनोविनोद के लिए उपन्यास पढ़ना चाहता था। परिणामतः प्रारंभ में जो हिंदी उपन्यास लिखे गए उनमे मनोरंजक उपन्यासों को सर्वाधिक महत्व मिला। इस समय उपन्यास की सफलता पाठकों को आकृष्ट करना और प्रतियों के हाथों-हाथ बिक जाने मात्र से मानी जाती थी (जैसा आज वर्तमान में होता है)। इस बात को ध्यान में रखकर अधिकांश लेखक अपने उपन्यास में पाठकों के लिए सुरसिक, रंगीले, मनचले, आनंद प्रेमी, रुपभिमानी जैसे शब्दों का प्रयोग करते थे।

हिंदी उपन्यासकारों को प्रेरणा पश्चिम के उपन्यासों से प्राप्त हो रही थी। पश्चिम में प्रारंभ से ही ऐसे उपन्यास लिखे जा रहे थे, जिनमे सामाजिक यथार्थ अभिव्यक्त हो रहा था लेकिन प्रारंभ में हिंदी के उपन्यासकारों ने पश्चिम के सनसनीखेज उपन्यासों की तरफ अपनी रूचि ज्यादा दिखाई। एडगर वैलेस, ओपेनहम जैसे उपन्यासकारों के उपन्यासों ने इन्हें अधिक प्रभावित किया। देवकी नंदन खत्री, दुर्गा प्रसाद खत्री, किशोरी लाल गोस्वामी, गोपालराम गहमरी, शिवनारायण द्विवेदी आदि उपन्यासकारों ने ऐसे उपन्यासों की रचना की, जो चमत्कारपूर्ण घटनाओं से पाठकों का खूब मनोरंजन करते थे। इन उपन्यासों की रचना का उद्देश्य ही होता था पाठकों को कौतुहलजन्य आनंद देना। ऐसे उपन्यासों की दो श्रेणियां हैं: – तिलिस्मी ऐयारी और जासूसी। दोनों तरह के उपन्यासों में चमत्कार और विस्मय से भरी घटनाओं की ऐसी भरमार है कि पाठक कदम-कदम पर अचंभित होता हुआ उपन्यास के मनोरंजक जादुई संसार में पहुँच जाता है। इस तरह के उपन्यासों में सबसे ज्यादा प्रसिद्धि देवकी नंदन खत्री, दुर्गा प्रसाद खत्री और गोपाल राम गहमरी के उपन्यासों को मिली।

हिंदी के धुरंधर जासूसी उपन्यास लेखक गोपाल राम गहमरी का जन्म पौष कृष्ण गुरुवार संवत् 1923 (सन् 1866 ई / सन 1856 . (यह जानकारी ग़ाज़ीपुर के सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध है)) में बारा, जिला ग़ाज़ीपुर में हुआ। गोपाल राम गहमरी के पिता का नाम राम नारायण था। उनके पूर्वज फ्रांसीसी -सेण्ट के व्यापारी थे। गोपाल राम गहमरी जब छह मास के थे तभी पिता का देहांत हो गया और इनकी माँ इन्हें लेकर अपने मायके ‘गहमर’ चली आईं। गहमर में ही गोपाल राम का लालन-पालन हुआ। प्रारंभिक शिक्षा-संस्कार यहीं संपन्न हुए। गहमर से अतिरिक्त लगाव के कारण उन्होंने बाद में अपने नाम के साथ अपने इस ननिहाल को जोड़ लिया और गोपालराम गहमरी कहलाने लगे।

गोपाल राम गहमरी ने १८७९ में गहमर, ग़ाज़ीपुर से मिडिल की परीक्षा पास की। फिर वहीं गहमर स्कूल में चार वर्ष तक छात्रों को पढ़ाते रहे और खुद भीउर्दूऔरअंगरेजीका अभ्यास करते रहे, क्यूंकि उम्र कम होने और धनाभाव के कारण आगे की पढ़ाई नहीं कर सकते थे। इसके बाद पटना नार्मल स्कूल में भर्ती हुए, जहां इस शर्त पर प्रवेश हुआ कि उत्तीर्ण होने पर मिडिल पास छात्रों को तीन वर्ष पढ़ाना पड़ेगा। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण इस शर्त को स्वीकार कर लिया। लेकिन बीच में ही पढ़ाई छोड़कर गहमरी जी  बेतिया  महाराजा स्कूल में हेड पंडित (हेडमास्टर) की जगह पर कार्य करने चले गए। बलिया रह कर कुछ दिनों तक ‘बंदोबस्त’ का काम भी देखा और सन 1888 ई में सब कामों से छुट्टी कर प्रथम श्रेणी में नार्मल की परीक्षा पास की। इसके तुरंत बाद 1889 में  रोहतासगढ़  में ‘हेडमास्टर’ नियुक्त हो गए। मगर, यहां भी वे टिक नहीं पाए और एक साल तक काम करने के बाद बंबई के प्रसिद्ध प्रकाशक सेठ गंगाविष्णु खेमराज के आमंत्रण पर 1891 में बंबई चले गए।

गहमरी जी जब रोहतासगढ़ में थे तो वहीं से पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाएं भेजा करते थे। जब बंबई में रहने लगे तो वहां भी उनकी कलम गतिशील रही। यह अलग बात है कि वे वहां भी अधिक दिनों तक नहीं टिक सके। चूंकि खेमराज का व्यवसाय पुस्तकों के प्रकाशन का था, इसलिए वहां उनके लिए रचनात्मकता के लिए कोई विशेष जगह नहीं थी। पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन वहां से होता नहीं था। इसलिए, यहां अपने अनुकूल अवसरों को न देखकर वहां से त्यागपत्र देकर कालाकांकर चले आए। कालांकाकर (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) से निकलने वाले दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के गहमरी जी नियमित लेखक थे। इसके साथ ही उस समय की श्रेष्ठ पत्र-पत्रिकाएं ‘बिहार बंधु’, ‘भारत जीवन’, ‘सार सुधानिधि’ में भी नियमित लिखते थे।

जब 1892 में गहमरी जी राजा रामपाल सिंह के निमंत्रण पर कालाकांकर चले आए तो यहां वे संपादकीय विभाग से संबंद्ध हो गए और एक वर्ष तक रहे। यहीं पर काम करते हुए बांग्ला सीखी और अनुवाद के जरिए साहित्य को समृद्ध करने का प्रयास भी किया। उन्होंने ‘बनवीर’ ‘बभ्रुवाहन’, ‘देश दशा’, ‘विद्याविनोद’, ‘चित्रागंदा’ आदि बंगला नाटकों के अनुवाद किये। ‘चित्रांगदा’, ठाकुर रविन्द्र नाथ टैगोर जी की रचना थी जिसका पहला आधिकारिक अनुवाद गहमरी जी ने किया था।

गहमरी जी एक जगह बहुत दिनों तक नहीं टिकते थे। एक बार फिर सन् 1893 में वे बंबई की ओर उन्मुख हुए और यहां से निकलने वाले पत्र बंबई व्यापार सिंधु का संपादन करने लगे। इस पत्र को वहां के एक निर्भीक और असीम साहसी पोस्टमैन निकालते थे। लेकिन इस पत्र का दुर्भाग्य कहें या गहमरी जी का कि यह पत्र छह महीने के बाद बंद हो गया, लेकिन गहमरी जी बेकार नहीं हुए। वहीं के एक हिंदी प्रेमी एस. एस. मिश्र ने गहमरी जी को बुलाकर उन्हें भाषा भूषण के संपादन का भार सौंपा। यह पत्र मासिक था। लेकिन यह पत्र भी बंद हो गया। लेकिन इसके बंद होने के पीछे न आर्थिक कारण थे न अन्य दूसरी तरह की प्रकाशकीय समस्याएं। बल्कि इस पत्र को एक दंगे के कारण बंद कर देना पड़ा।

भाषा भूषण के बंद होने के गहमरी जी बाद नए ठौर की तलाश में चल पड़े। इनके चाहने वालों और इन पर स्नेह रखने वालों की कमी नहीं थी। उन्हीं में थे पं. बालमुंकुद पुरोहित। इन्हीं की कृपा से गहमरी जी मंडला की ओर रुख किए। लेकिन यहां भी बहुत दिनों तक नहीं रह सके। यहां से मासिक गुप्तकथा का प्रकाशन तो शुरू हुआ, लेकिन अर्थाभाव के कारण इस पत्र को असमय बंद कर देना पड़ा। गहमरीजी एक बार फिर चौराहे पर आ गए। लेकिन इस चौराहे से एक रास्ता फूटा जो बंबई की ओर जाता था। खेमराज जी ने श्री वेंकटेश्वर समाचार नाम से पत्र का प्रकाशन शुरू कर दिया था। यह पत्र गहमरी जी के कुशल संपादन में थोड़े समय में ही लोकप्रिय हो गया। इसी दौरान प्रयाग से निकलने वाले प्रदीप‘ (बांग्ला) में ट्रिब्यून के संपादक नगेंद्रनाथ गुप्त की एक जासूसी कहानी हीरार मूल्य प्रकाशित हुई थी। गहमरीजी ने इस कहानी का हिंदी में अनुवाद कर ‘श्री वेंकटेश्वर समाचार’ में कई किश्तों में प्रकाशित किया। यह जासूसी कहानी पाठकों को इतनी रुचिकर लगी कि कई पाठकों ने इस पत्र की ग्राहकता ले ली।

उस दौर में जासूसी ढंग की कहानियों में पाठकों की गहरी रुचि जग रही थी। इसमें कथा में रहस्य और रोचकता ऐसी अंतर्गुम्फित होती कि पाठकों के भीतर एक तरह की जिज्ञासा जगाती और पाठकों को पढ़ने को विवश  कर देती। गहमरी जी पाठकों के मन-मस्तिष्क को समझ चुके थे। हीरे का मोल के अनुवाद की लोकप्रियता और जोड़ा जासूस लिखकर पाठकों की प्रतिक्रियाओं से वे अवगत हो चुके थे। इस लोकप्रियता के कारण वे कई तरह की योजनाएं बनाने लगे। वे यह भी समझ चुके थे कि जासूसी ढंग की कहानियों के जरिए ही पाठकों का विशाल वर्ग तैयार किया जा सकता है। गहमरी जी पूरी तैयारी के साथ जासूसी ढंग के लेखन की ओर प्रवृत्त हुए। उल्लेखनीय बात यह भी है कि उनके साथ घटी कुछ घटनाओं ने भी जासूसी ढंग के लेखन की ओर उन्हें ढकेला। इस तरह 1899 में ही वे घर आकर जासूस निकालना चाहते थे, किंतु बालमुकुंद गुप्त के पुत्र की शादी होनी थी और वे भारत मित्र के संपादन का भार गहमरी जी को देकर अपने गांव गुरयानी चले गए। कुछ दिनों तक गहमरी जी ने भारत मित्र का कुशलता पूर्वक संपादन किया। इसकी वजह से जासूसका प्रकाशन थोड़े समय के लिए स्थगित हो गया। उनकी इच्छा थी कि सरस्वती के साथ ही जासूसका भी प्रकाशन हो, लेकिन यह इच्छा उनके मन में ही रह गई। इस तरह जासूस का प्रकाशन जनवरी, 1900 में सरस्वतीके साथ न होकर चार महीने बाद यानी मई 1900 में हुआ।

जासूसी उपन्यास पूरी तरह से यूरोप, खासकर इंग्लैण्ड की देन है। 19वीं सदी में सर आर्थर कानन डायल के उपन्यास काफ़ी लोकप्रिय हुए थे। उनके प्रभाव के कारण बंगला में और बाद में हिन्दी में जासूसी उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में चोरी, डकैती, हत्या आदि से संबंधित कोई भयंकर कांड हो जाता है और जासूस उसके सुराग को पाने में लग जाता है। फिर तो कथानक एक रहस्य से दूसरे रहस्य में उलझता हुआ तरह-तरह की घटनाओं में तब तक फंसता-निकलता रहता है जब तक जासूस अपने धैर्य, साहस, बल, बुद्धि और कौशल से रहस्य का पर्दाफ़ाश नहीं कर देता। जासूसी उपन्यास की घटनाएं जीवन की यथार्थ स्थिति के नज़दीक होती हैं। कल्पना से उनमें रहस्य का समावेश किया जाता है। इसके कारण कथानक जटिल और पेचीदा हो जाता है। इस तरह से इनमें मनोरंजन और कौतूहल का समावेश रहता है। साथ ही सत्य का उद्घाटन, नैतिकता का स्थापन और आदर्शवादी दृष्टि का पोषण भी इनका उद्देश्य होता है।

हालांकि गोपाल राम गहमरी जी कहीं भी बहुत अधिक दिन न टिके। इसका एक कारण कई पत्रिकाओं का आर्थिक दबाव में बंद हो जाना था। दूसरी और अहम वजह यह थी कि एक तरफ उनमें हिंदी भाषा के लिए कुछ अलग और वृहत करने की बेचैनी थी और दूसरी ओर उनके भीतर पनपती ‘जासूस’ की रूपरेखा भी। हालांकि ‘जासूस’ का निकलना और हिंदी भाषा की सेवा में कुछ नया करना दो अलग मुद्दे नहीं थे। वे ‘जासूस’ निकालकर ही इस भाषा के लिए कुछ नया करना चाहते थे।

गहमरी जी ने भारत मित्रके संपादन के दौरान जासूस के निकलने की सूचना दे दी थी। इसका लाभ यह हुआ कि सैकड़ों पाठकों ने प्रकाशित होने से पहले ही पत्रिका की ग्राहकी ले ली। एक और उल्लेखनीय बात यह है कि हिंदी में जासूसशब्द के प्रचलन का श्रेय गहमरी जी को ही जाता है। उन्होंने लिखा है कि 1892 से पहले किसी पुस्तक में जासूस शब्द नहीं दिख पड़ा था।’ उन्होंने अपनी पत्रिका का नामकरण ऐसे किया जिससे आम पाठक आसानी से उसकी विषय वस्तु को समझ सके। जासूसशब्द से हालांकि यह बोध होता है कि इसमें जासूसी ढंग की कहानियां ही प्रकाशित होती होंगी, लेकिन ऐसी बात नहीं थी। उसके हर अंक में एक जासूसी कहानी के अलावा समाचार, विचार और पुस्तकों की समीक्षाएं भी नियमित रूप से छपती थीं। जासूस निकालने के लिए उन्हें कुछ धन की आवश्यकता थी, इसकी पूर्ति उन्होंने मनोरमा और मायाविनी लिखकर कर की। जासूसका पहला अंक बाबू अमीर सिंह के हरिप्रकाश प्रेस से छपकर आया और पहले ही महीने में वीपीपी से पौने दो सौ रुपए की प्राप्ति हुई एवं यह उस जमाने में प्री बुकिंग से मिलने वाली राशि थी। इसने अपने प्रवेशांक से ही लोकप्रियता की सारी हदों को पार करते हुए शिखर को छू लिया था। इसकी अपार लोकप्रियता को देखकर गोपालराम गहमरी जब जासूसी ढंग की कहानियों और उपन्यासों के लेखन की ओर प्रवृत्त हुए तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और न इसकी परवाह की कि साहित्य के तथाकथित अध्येता उनके बारे में क्या राय रखते हैं। अपने प्रवेशांक में ‘जासूस’ की परिचय कुछ इस अंदाज में पेश किया-

जासूस की डायरी’ नामक कहानी में एक इलस्ट्रेशन
जासूस की डायरी’ नामक कहानी में एक इलस्ट्रेशन

डरिये मत, यह कोई भकौआ नहीं है, धोती सरियाकर भागिए मत, यह कोई सरकारी सीआईडी नहीं है। है क्या? क्या है? है यह पचास पन्ने की सुंदर सजी-सजायी मासिक पुस्तक, माहवारी किताब जो हर पहले सप्ताह सब ग्राहकों के पास पहुंचती है। हर एक में बड़े चुटीले, बड़े चटकीले, बड़े रसीले, बड़े गरबीले, बड़े नशीले मामले छपते हैं। हर महीने बड़ी पेचीली, बड़ी चक्करदार, बड़ी दिलचस्प घटनाओं से बड़े फड़कते हुए, अच्छी शिक्षा और उपदेश देने वाले उपन्यास निकलते हैं। कहानी की नदी ऐसी हहराती है, किस्से का झरना ऐसे झरझराता है कि पढऩे वाले आनंद के भंवर में डूबने-उतराने लगते हैं।

यह था गोपाल राम गहमरी की मासिक पत्रिका ‘जासूस’ का विज्ञापन जो उनके ही संपादन में आने वाले अखबार ‘भारत मित्र’ में आया था और जिसने उस वक्त के हिसाब से बाजार में हलचल पैदा कर दी थी। नतीजा यह हुआ था कि प्रकाशित होने से पहले ही सैकड़ों पाठक इसकी वार्षिक सदस्यता ले चुके थे। किसी पत्रिका के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार घटित हुआ था। यह 1900 की बात है।

हिंदी भाषा और जासूस से उनके लगाव और प्रेम को जानने के लिए उदाहरण काफी है। इस बीच उन्हें एक बार फिर बंबई जाने का अवसर मिला। ‘श्री वेंकटेश्वर समाचार’ समाचार पत्र निकल रहा था। उन्हें संपादक की जरूरत थी। यद्यपि उस समय उस पत्र के संपादक यशस्वी लेखक लज्जाराम मेहता जी थे। उन्हें अपने घर ‘बूंदी’ जाना था। इसलिए पत्र को एक संपादक की जरूरत थी। गहमरी जी उनके बुलावे पर गए और कार्यभारा संभाला, लेकिन जासूस बंद नहीं हुई। वह लगातार निकल रही थी। इस बीच गहमरी जी के समक्ष सेठ रंगनाथ/रामदास (भिन्न-भिन्न सोर्स पर अलग-अलग नाम है।) ने प्रस्ताव रखा कि ‘जासूस’ उनको दे दिया जाए और आजन्म रु 50 बतौर गुजारा लेते रहें। सेठ जी ने उनके समक्ष यह भी प्रस्ताव रखा कि बंबई में रहने की इच्छा न हो जो ‘गहमर’ से ही लिखकर भेज दिया करें, प्रकाशित करता रहूंगा। लेकिन, गहमरी जी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और अपने गांव लौट आए। अपनी तंगहाली के बावजूद गोपालराम गहमरी ने इसके लिए साफ़ मना कर दिया था। कारण कि उन्हें संदेह था कि कोई और ‘जासूस’ को ठीक उनकी तरह चला सकता है, या फिर किसी के अंकुश में रहते हुए वे खुद भी यह कर पायेंगे।

दरअसल अपने समय को कई बार हम सधे-सीधे न व्यक्त करके फैंटेसी में व्यक्त करते हैं। तो ‘जासूसी कथा’ गहमरी जी की चुनी हुई फैंटेसी थी जिसमें वे अपनी बात कहते रहे। यह मामूली बात न थी कि अपने ननिहाल के उस गांव गहमर जिसमें कि उनका जन्म ह़ुआ था, जहां पर वे अपने पिता की मृत्यु के बाद पले-बढ़े, जिसे वे इतना प्यार और सम्मान करते थे कि उन्होंने उससे अपना नाम ही जोड़ लिया था; इस तरह यह पत्रिका अपनी पाठकों की बदौलत और उनके अपार स्नेह के कारण एक दो वर्ष नहीं, उसी गहमर से जासूस पत्रिका वे लगातार 38 साल तक निकालते रहे, बिना किसी बड़े और बाहरी सहयोग के। पत्रिका के लिए उनके इस मनोयोग की तुलना पूर्व में सिर्फ बालकृष्ण शर्मा के मुफलिसी में रहते हुए ‘प्रदीप’ को प्रदीप्त रखने से की जा सकती है या फिर हाल-फिलहाल में राजेंद्र यादव के हंस निकालने से।

इस दौरान गहमरी जी ने जासूसी विधा से हटकर आध्यात्मिक विषय की दो पुस्तकें लिखीं। इच्छाशक्ति उनकी बंगला से अनुवादित रचना थी और मोहिनी विद्या, मैस्मेरिज्म पर अनूठी और हिंदी में संभवत: पहली रचना थी। ये दोनों पुस्तकें हिंदी पाठकों द्वारा काफी पसंद की गईं। बाद के दिनों में जासूसी लेखन से उनकी विरक्ति भी हो गई थी और वे धर्म-अध्यात्म की ओर मुड़ गए थे।

गहमरी जी का कहना था कि “जिसका उपन्यास पढ़कर पाठक ने समझ लिया कि सब सोलहो आने सच है, उसकी लेखनी सफल परिश्रम समझनी चाहिए।” गहमरी जी अपनी रचनाओं में पाठकों की रुचि का विशेष ध्यान रखते थे कि वे किस तरह की सामग्री पसंद करते हैं। साहित्य के संदर्भ में उनके विचार भी उच्च कोटि के थे। वे साहित्य को भी इतिहास मानते थे। उनका मानना था कि साहित्य जिस युग में रचा जाता है, उसके साथ उसका गहरा संबंध होता है। वे उपन्यास को अपने समय का इतिहास मानते थे। गुप्तचर, बेकसूर की फांसी, केतकी की शादी, हम हवालात में, तीन जासूस, चक्करदार खून, ठन ठन गोपाल, गेरुआ बाबा, मरे हुए की मौत आदि रचनाओं में केवल रहस्य रोमांच ही नहीं हैं, बल्कि युग की संगतियां और विसंगतियां भी मौजूद हैं। समाज की दशा और दिशा का आकलन भी है। यह कहकर कि वे जासूसी और केवल मनोरंजक रचनाएं हैं, उनकी रचनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता है, न उनके योगदानों से मुंह मोड़ा जा सकता है। गहमरी जी की बाद की पीढ़ी को जो लोकप्रियता मिली, उसका बहुत कुछ श्रेय देवकीनंदन खत्री और गहमरी जी को ही जाता है। इन्होंने अपने लेखन से वह स्थितियां बना दी थी कि लोगों का पढऩे की ओर रुझान बढ़ गया था। गहमरी जी ने अकेले सैकड़ों कहानियों, उपन्यासों के अनुवाद किए।

देवकी नंदन खत्री के बाद गोपाल राम गहमरी ही वे अकेला नाम हैं जिन्हें पढ़ने की खातिर कितने ही अहिंदी भाषा भाषियों ने हिंदी भाषा सीखी। जिसे हम हेय भाव के साथ लुगदी साहित्य कहते हैं हिंदी में खत्री जी के साथ गोपालराम गहमरी ही उसके प्रणेता रहे हैं। लुगदी साहित्य का स्वर्णकाल इन्हीं दोनों के नाम से जुड़ा हुआ है और जो भी मान सम्मान इस साहित्य का रहा वह भी इन दोनों तक ही रहा। बाद में अकादमिक और साहित्यिक भेदभाव ने इस विधा को अछूतों की श्रेणी में रख दिया। बिना यह सोचे कि आधुनिक हिंदी की यात्रा इसी से शुरू होती और फैलती है। उनके इस योगदान के लिए पंडित रामचंद्र शुक्ल ने भले ही अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में इनकी सराहना की पर अधिकांशतः आलोचकों और साहित्य इतिहासकारों ने इन पर उपेक्षा भरी दृष्टि डालने से भी इनकार कर दिया।

गोपालराम गहमरी के मौलिक जासूसी उपन्यासों की संख्या ही 64 है। अनूदित उपन्यासों को भी मिला दें तो यह 200 के करीब पहुंच जाती है। bhojpurउनकी प्रमुख कृतियां हैं- सरकती लाश, अद्भुत लाश, बेक़सूर को फांसी, डबल जासूस, भयंकर चोरी, गुप्त भेद आदि। इस प्रचुरता में लिखे जाने का एक कारण वह दबाव भी था कि जासूस में हर माह एक जासूसी उपन्यास जाना ही होता था। उनके लिखे के प्रभाव को इससे भी आंका जा सकता है की ‘हंस’ पत्रिका के किसी शुरुआती विशेषांक में गौतम सान्याल ने लिखा कि, “प्रेमचंद के जिस उपन्यास को पठनीयता की दृष्टि से सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, उस गबनकी अनेक कथा स्थितियां एक विदेशी क्राइम थ्रिलर से मिलती-जुलती हैं और जिसका अनुवाद गोपालराम गहमरी ने सन् 1906 में जासूस पत्रिका में कर चुके थे।” इस उद्धरण से गोपालराम गहमरी के बारे में कुछ और कहने की जरूरत नहीं है।

हालांकि इन दोनों लेखकों की बची-खुची साख ही थी कि इन दोनों द्वारा शुरू ‘जासूसी लेखन’ की परंपरा साहित्यिक पंडितों की उपेक्षा और तिरस्कार के बावजूद लंबे समय तक चलती रही। इस परंपरा से इस विधा को न जाने कितने नए लेखक मिले। ओमप्रकाश शर्मा, चन्दर, कुशवाहा कान्त, वेद प्रकाश काम्बोज, सुरेन्द्र मोहन पाठक, परशुराम शर्मा, राज भारती, वेद प्रकाश शर्मा, प्रकाश भारती, अनिल मोहन  जैसे नाम इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए सामने आये।

गहमरी जी ने ‘नारी-प्रधान’ एक नाटक ‘विद्या-विनोद’ भी लिखा जो उस समय ‘नारी-समस्या’ पर केन्द्रित था। वहीँ उस दौर में जब ‘राष्ट्रीय एवं व्यंगात्मक’ नाटकों का चलन था तब उन्होंने अपना नाटक ‘देश-दशा’ (१८९२) में लिख कर स्वयं को बहुमुखी प्रतिभा का धनी बताने में कोई संकोच नहीं किया।

गोपाल राम गहमरी जी ने ‘जासूसी उपन्यासों’ के लेखन में प्रसिद्धि प्राप्त करने के साथ ही ‘सास-पतोहू’, ‘बड़ा भाई’, ‘देवरानी-जेठानी’, ‘दो बहनें’एवं ‘तीन-पतोहू’ नामक सामाजिक उपन्यास लिख कर इस विधा में भी हाथ आजमाया। उन्होंने सन १८९४ में ‘वसंत विकास’ नामक एक कविताओं की पुस्तिका भी लिखी।

सरल ,सुगम और सुबोध हिंदी का प्रचार गोपाल राम गहमरी के साहित्यक कार्य का महत्वपूर्ण हिस्सा था । हमेशा ही सरल सबके समझने योग्य हिन्दी लिखते रहे, पंडिताऊ या संस्कृतनिष्ठ हिन्दी जिसे समझने के लिए कोश उठाना पड़े, उनको नापसंद थी। वे ऐसी भाषा की निंदा करते थे जिसको समझने के लिए शब्दकोष उठाना पड़ जाए। लेखन को लेकर गहमरी जी की दृष्टि बहुत साफ और सुलझी हुई थी। किसी कथा और उपन्यास के अच्छे होने का मानक उनके लिए यह था कि “कहानी के पूर्णतः कल्पित होने के बाबजूद जिसे लोग सोलहों आने सच समझे।” खड़ी बोली या ब्रज भाषा के सवाल पर न सिर्फ खड़ी बोली के पक्ष में पं. श्रीधर पाठक का समर्थन किया बल्कि खड़ी बोली के विरोधी प्रताप नारायण मिश्र (जो भारतेंदुकाल के प्रबल रचनाकार और पत्रकार थे) से कालाकांकर में मुलाकात कर उनको इस विषय में अपने विचारों से अवगत कराया, जिसे बाद में प्रताप नारायण मिश्र ने भी स्वीकार किया।

यह भी एक विचित्र संयोग है कि तिलस्मी साहित्य के साथ-साथ जासूसी की भी अचानक बाढ़ आ गयी और भी पाठकों ने सराहा और अपनाया। हिंदी में जासूसी उपन्यासों के प्रेणता गोपाल राम गहमरी हैं। देवकी नंदन की ‘चंद्रकांता’ (1892) और ‘नरेन्द्र मोहिनी’ (1893) के थोड़े समयांतराल बाद ‘अदभुत लाश’ (1896) और ‘गुप्तचर’ (1899) के साथ गहमरी भी उदित हुए। इन जासूसी उपन्यासों की बढ़ती लोकप्रियता से प्रेरित होकर गहमरी ने प्रभूत मात्रा में साहित्य रचा (लेख के अंत में पूरी सूची देखें)। जासूसी साहित्य के प्रभाव से समकालीन हिंदी लेखक भी अपने को विरत न रख सके और इसी अवधि में ऐसी अनेकानेक रचनाएं सामने आई। यथा-रूद्रदत्त शर्मा कृत ‘वर सिंह दारोगा’ (1900), ‘किशोरी लाल गोस्वामी कृत ‘जिंदे की लाश’ (1906), ‘जयराम गुप्त कृत ‘लंगड़ा खूनी’ (1908), जंग बहादुर सिंह कृत ‘विचित्र खून’ (1909) शेर सिंह कृत ‘विलक्षण जासूस’ (1911), ‘चंद्रशेखर पाठक कृत ‘अमीर अली ठंग’ (1911), ‘शशि बाला’ (1911) और शिव नारायण द्विवेदी कृत ‘अमर दत्त’ (1915) आदि। किन्तु उन्हें गहमरी के समान ख्याति नहीं मिली।

लेकिन यहीं से यह परंपरा समाप्तप्राय है। कारण यह कि हिंदी में यह परंपरा नवीन थी और आंग्ल साहित्य से पूर्णतः प्रभावित। भारतीय वातावरण के अनुरूप न होने के कारण पाठक जल्दी इससे ऊब गया। पाठकों की अरूचि ने तिलस्मी, ऐयारी और जासूसी साहित्य का अचिर में ही गर्भलोपन भी कर दिया। प्रेमचंद के अवतरण के साथ ही चित्रपट पूरी तरह परिवर्तित हो चुका था। 1917-18 के आस-पास तिलस्मी और जासूसी साहित्य नेपथ्य में चले गये।

गोपाल राम गहमरी पेशे से पत्रकार थे। वे अकेले ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने घमरी में बाल गंगाधर तिलक के पूरे मुकदमे को अपने शब्दों में दर्ज किया था। भिन्न-भिन्न समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं में सम्पादकीय योगदान के कारण उनकी गिनती हिन्दीपत्रकारिताकेविकासयुग – आदि युग’ में प्रमुख संपादकों में किया जाता है। बाद के दिनों में वे काशी चले आये और बनारस के बेनियाबाग के पास भवन बना कर वहीँ रहने लगे और साथ ही अखबारों और पत्रिकाओं में रोचक संस्मरण लिखते रहे। बनारस में ही, ८० वर्ष की आयु में 20 जून 1946 में उनका देहांत हुआ।

इन्टरनेट पर उपलब्ध जानकारियों के अनुसार बीते कई वर्षों से ‘गहमर’ में उनके सम्मान में कई साहित्यिक आयोजन किये गए एवं उस दौरान कई ‘लेखकों एवं साहित्यकारों’ को सम्मानित भी किया गया। साथ ही ऐसे आयोजन के दौरान ‘पुस्तक मेले’ का भी आयोजन किया गया। ‘गहमरी जी’ को सम्मानित करते हुए ‘गहमर’ में उनके नाम पर एक पुस्तकालय भी है – ‘गोपाल राम गहमरी पुस्तकालय’। यह पुस्तकालय पूर्ण रूप से अभी एक्टिव है लेकिन इन्टरनेट के बढ़ते प्रभाव के कारण वहां पाठकों की गतिविधि बहुत कम हो चुकी है|

बाबू गोपाल राम गहमरी के लिखे हुए मौलिक जासूसी उपन्यास हैं –

  1. बेकसूर की फांसी 
  2. सरकती लाश 
  3. बेगुनाह का खून 
  4. जमुना का खून 
  5. डबल जासूस
  6. खूनी कौन है
  7. मायाविनी 
  8. लड़की की चोरी
  9. जादूगरनी मनोरमा
  10. थाना की चोरी 
  11. भंयकर चोरी 
  12. जासूस की भूल
  13. अंधे की आंख
  14. जासूस की चोरी
  15. जाल राजा 
  16. जाली काका 
  17. मालगोदाम में चोरी 
  18. डाके पर डाका 
  19. डाक्टर की कहानी 
  20. जासूस पर जासूस
  21. घर का भेदी
  22. देवी सिंह 
  23. लड़का गायब 
  24. जासूस चक्कर में  
  25. खूनी का भेद
  26. भोजपुर की ठगी 
  27. बलिहारी बुद्धि 
  28. योग महिमा
  29. गुप्तभेद 
  30. अजीब लाश
  31. गुप्त भेद
  32. गुप्तचर
  33. गाड़ी में खून
  34. किले में खून
  35. भयंकर चोरी
  36. रूप संयासी
  37. लटकती लाश
  38. कोतवाल का खून
  39. हम हवालात में
  40. खूनी
  41. ठगों का हाथ
  42. लाश किसकी है
  43. आंखों देखी घटना
  44. मटोपटो
  45. हत्या कृष्णा
  46. अपराधी की चालाकी
  47. सुंदर वेनी
  48. अपनी राम कहानी
  49. विकट भेद
  50. जासूस की विजय
  51. मुर्दे की जांच
  52. मेम की लाश
  53. जासूस की जवानमर्दी
  54. जासूसी पर
  55. जैसा मुंह वैसा थप्पड़
  56. सरवर की सुरागरसी
  57. खूनी की चालाकी
  58. चांदी का चक्कर
  59. गुसन लाल दरोगा
  60. भीतर का भेद
  61. धूरंधर जासूस
  62. हमारी डायरी
  63. खूनी की खोज
  64. जासूस की डायरी
  65. जासूस की बुद्धि
  66. कैदी की करामात
  67. देवी नहीं दानवी
  68. सोहनी गायब
  69. डॉक्टर की कहानी
  70. केशबाई
  71. केतकी की शादी
  72. नीमा
  73. अर्थ का अनर्थ
  74. मरे हुए की मौत
  75. भयंकर चोरी
  76. देखी हुई घटना
  77. जासूस जगन्नाथ
  78. नगद नारायण
  79. डकैत कालूराम
  80. भयंकर भेद
  81. स्वयंबरा
  82. भंडाफोड़
  83. रहस्य विपल्व
  84. होली का हरझोग
  85. जमीदारों का जुल्म

इसके अतिरिक्त उनके द्वारा अनुवादित और रूपांतरित उपन्यासों की एक लम्बी फहरिश्त है। उपर्युक्त सूची ‘अधूरी’ है क्यूंकि ‘गहमरी’ जी के रचनाओं के बारे में कहीं भी पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं| उपरोक्त सूचि भी ‘इन्टरनेट’ पर हासिल नामों को संकलित करके बनायी गयी है|

 

बाबू गोपाल राम गहमरी द्वारा कही/लिखी गयी सूक्तियां:-

  • बुद्धि के रासभ और अक्ल के खोते
  • नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है।’

गोपाल राम गहमरी पर रचित पुस्तक:

  • हिंदी के पहले जासूसी कथाकार – गोपाल राम गहमरी के संस्मरण (लेखक – संजय कृष्णा, प्रकाशन – विकल्प प्रकाशन)

v आप गोपाल राम गहमरी द्वारा लिखित कुछ उपलब्धसंस्मरणएवंकहानियांनिम्न लिंक पर पढ़ सकते हैं:-

क्रेडिट एवं सोर्स –

  • लेख क्रेडिट – डॉ. कमल कुमार मिश्र जी द्वारा ‘गोपालराम गहमरी’ पर लिखा गया लेख प्रेरणास्रोत के रूप में रहा|
  • लेख क्रेडिट- स्क्रॉल.इन, गूगल बुक्स आदि कई वेबसाइट|
  • फोटो क्रेडिट – गूगल इमेज सर्च