समीक्षा : कोहिमा कांस्पीरेसी

जनाबेहाज़रीन, मुझे खुद याद नहीं कि पिछली दफा मैंने किसी पुस्तक को पढ़ने के बाद समीक्षा कब की थी। बहरहाल जहां तक मुझे याद पड़ता है, मैंने बीते 1 वर्ष में गिनती की ही किताबें पढ़ी हैं और कई तो आधी पढ़कर रख छोड़ी है लेकिन उनके बारे में लिखने के लिए वो माकूल समय नहीं मिल पाया। अब सोच रहा हूँ, हफ्ते में एक किताब पढ़ लूं और उसके बारे में अपने मित्रों को जरूर बताऊं।

आज जिस पुस्तक के बारे में बात करने जा रहा हूँ – उसका नाम है – कोहिमा कॉन्सपिरेसी। इस उपन्यास के लेखक संतोष पाठक जी हैं। यह उपन्यास थ्रिल वर्ल्ड नामक नई प्रकाशन संस्था से इसी माह प्रकाशित होकर आया है। लगभग 260 पन्नों में फैली, यह क्राइम थ्रिलर कथा, ईबुक एवं पेपरबैक दोनों ही फॉर्मैट में उपलब्ध है। आपके खादिम ने इस पुस्तक को ईबुक फॉर्मैट में पढ़ा है। समीक्षा के अंत में आपसे दोनों ही लिंक शेयर किया गया है ताकि आप भी उपन्यास पढ़कर अपने विचार शेयर कर सकें।

पूर्व में, मैं संतोष पाठक जी के दो उपन्यास – “दस जून की रात” एवं “हैरतअंगेज हत्या” – पढ़ चुका हूं, लेकिन उसके संबंध में कोई विस्तृत राय देने का मौका अभी प्राप्त नहीं हुआ है। आशा है कि भविष्य इनके संबंध में कुछ लिखने का समय प्राप्त हो।

अब बात करते हैं – कोहिमा कॉन्सपिरेसी – की।

यह उपन्यास किसी दक्षिण भारतीय फिल्म के हिसाब से आरंभ होती है और उसी फॉर्मूले को कंटिन्यू करते हुए, अंत में जाकर खत्म होती है। मतलब यह कि पूर्वाभास में गोलियों की बौछार से आरंभ होकर, अनगिनत खूरेंजी दास्तानों से लेकर, अंत में भी खून-खराबे पर खत्म होती है।

क्राइम फिक्शन उपन्यासों के लिए कहा जाता है कि फर्स्ट इम्प्रेशन इज लास्ट इम्प्रेशन यानि अगर आपका पाठक शुरुआती पन्नों को पूरा पढ़ गया और उसके दिमाग में आप वो थ्रिल, सस्पेंस, मिस्ट्री और टेंशन आदि क्रीऐट कर पाए तो पाठक अंत तक उपन्यास को पढ़ जाएगा।

बेगूसराय, बिहार का एक दुर्दांत पुलिसिया, दुर्दांत शब्द मूलतः अपराधीयों से जोड़ा जाता है, उस क्षेत्र के विधायक के सरपरस्ती में, कानून का मखौल उड़ाता है लेकिन फिर अपने गॉडफादर विधायक की इच्छा से कानून की गिरफ्त में फंस जाता है। आगे वह कानून के चंगुल से बच निकलता है, बच क्या निकलता है, बचा लिया जाता है और कानून से छुपे रहने के लिए दीमापुर पहुंचता है, जहां उसकी नज़र एक ऐसी लड़की से टकराती है, जिसकी मोहब्बत उसे पिंजरे में फंसा चूहा बना कर छोड़ती है। इसी पिंजरे से निकलने की जद्दोजहद में वह एक ऐसे अनजाने षड्यंत्र का शिकार होता है जिसमें वह पूरे नागालैंड को अपना दुश्मन बना लेता है।

पूरा नागालैंड उसका दुश्मन इसलिए बन जाता है क्योंकि जिस लड़की से वह एक नज़र में मोहब्बत कर बैठता है, वह नागालैंड के बेताज बादशाह, अंडरवर्ल्ड माफिया किंग की इकलौती बेटी निकलती है जिससे कुछ महीने की कोर्टशिप के बाद वह शादी कर लेता है लेकिन यह शादी का बंधन उसे कुछ दिनों बाद गुलामी की जंजीर मालूम पड़ती है।

वह जब भी अपनी इस जंजीर को तोड़कर निकलने की कोशिश करता है, लड़की का बाप, नागालैंड का बादशाह – जिसका बनाया कानून ही असली कानून है, बाकी भारतीय कानून तो वहां प्रतीकात्मक गुब्बारे के समान था, जिसमें कभी भी वह बादशाह छेद करके उसे लुप्त कर सकता था – उसकी इन कोशिशों पर पानी फेर देता था।

आगे वह पुलिसिया अपने पत्नी के कत्ल में ही फंसता है और उस बादशाह के जुल्मो-सितम के साथ-साथ पूरे नागालैंड का घोषित दुश्मन बन जाता है क्योंकि अगर कोई भी उसे दोस्त बनाता तो वह भी अंडरवर्ल्ड के बादशाह का दुश्मन होता और ऐसे दुश्मनों की एक ही जगह थी बादशाह और उसके प्यादों की नज़र में – जन्नत।

आगे की कहानी में वह किस तरह अपनी पत्नी के कत्ल की पहेली को, अपनी जान बचाते हुए, सुलझाता है, पठनीय है।

आइए इस कहानी के उन एलिमेंट्स पर तबसरा करें जो कि किसी क्राइम फिक्शन उपन्यास का हिस्सा होते हैं।

प्रस्तुतीकरण (Presentation) :-

लेखक महोदय ने कहानी को तीसरे पर्सन में पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है। कहानी आरंभ ‘वर्तमान’ से होती है, फिर ‘पूर्वाभास’ में जाती है फिर ‘वर्तमान’ में आगे बढ़ने लगती है। छोटे संवाद और भाषाशैली के जरिए – कोहिमा के छोटे से छोटे डीटेल, जो निःसंदेह लेखक ने रिसर्च द्वारा प्राप्त किया है – कहानी को पठनीय रूप में प्रस्तुत किया गया है। वहीं किरदारों के चित्रण के लिए उसके जीवन में घटी महत्वपूर्ण घटनाओं को प्रसंगों के जरिए पेश किया गया है।

भाषाशैली (Language Style):-

उपन्यास की भाषाशैली भी पठनीय है। संतोष पाठक जी ने कहानी में हिंदी और अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल किया है, वहीं उन्होंने कोहिमा की लोकल भाषा का भी इस्तेमाल किया है, जो कि साइलेंट मोड में है, जिसका कोई न कोई किरदार अनुवाद करता नजर आया है। कहानी के पूर्वाभास वाले हिस्से में,  बेगूसराय, बिहार के उस हिंदी डायलेक्ट का इस्तेमाल किया गया है जिसका कि अमूमन प्रत्येक लेखक इस्तेमाल करता है। वहीं कोहिमा में, हिंदी बोलने के डायलेक्ट को एक अलग रूप में दिखाया जिससे यह पता चलता है कि वहां के बाशिन्दे आसानी से हिंदी बोल नहीं पाते हैं।

संवाद (Dialogues) :-

लेखक ने आरम्भ में कहानी को डिटेलिंग और छोटे संवादों के जरिये बढ़ाया है जो कि कहानी की भूमिका के रूप में काम करता नजर आता है। लेकिन जब कहानी रफ्तार पकड़ना शुरू करती है तो डिटेलिंग कम और छोटे संवाद बढ़ते जाते हैं। इस उपन्यास की यह खूबी मानी जायेगी कि छोटे-छोटे संवादों और सीन्स के जरिये लेखक ने कहानी को वृहद पृष्ठों में ढालकर पाठकों को परोसा, जिससे पाठकगण कहीं भी बोर होते नज़र नहीं आएंगे। हालांकि बीच-बीच में कुछ जगह लेखक महोदय लड़खड़ाये और उन्होंने संवादों के स्थान पर डिटेलिंग का इस्तेमाल किया जो कि कहानी के फ्लो में, कहानी की जरूरत को समझते हुए, पाठक इग्नोर कर सकते हैं।

किरदारनिगारी (Characterization) :-

उपन्यास में किरदारों की भरमार है जिसमें पुलिसिया के किरदार अश्विन पंडित और पूर्वाभास में आये किरदारों को छोड़कर अन्य सभी कोहिमा से ही सम्बंधित हैं।

लेखक ने कथानक में मुख्य किरदार अश्विन पंडित नामक एक ऐसे पुलिसिये को रखा है, जो बालपन की दहलीज से ही अपराध की दुनिया में लिप्त है।

गजानन सिंह – बेगूसराय के दबंग विधायक, इनका किरदार छोटा है, लेकिन पुलिसिये के किरदार को स्थापित करने में मदद करता है।

नईफियो चांग – इस किरदार को उसी तरह का दिखाया गया है जैसा नॉर्थ कोरिया का किम जोंग, जर्मनी का हिटलर, इटली का मुसोलिनी एवं इराक का सद्दाम हुसैन हुआ है। मतलब एक ऐसा किरदार जिसका हुक्म पूरे नागालैंड पर चलता हो। जिसके आगे देश के कानून और समाज की कोई वैल्यू नहीं। जो क़त्ल करना, मास-मर्डर करना, ब्रुचुअल क्राइम करना, रोज रोटी खाने जैसा समझता हो। क्षेत्र में भारतीय कानून को अपने पैरों तले रौंद कर, अपनी तानाशाही चलाता हो।

सिरोही लिली चांग –  माफिया अंडरवर्ल्ड के बादशाह नईफियो चांग की इकलौती बेटी होते हुए भी इस किरदार को आरम्भ में छुई-मुई सी लड़की के रूप में पेश किया गया। अश्विन पंडित इसी लड़की पर अपनी जान फिदा करता है एवं आगे जाकर विवाह करता है फिर अपनी जान को सांसत में फँसाता है। लेकिन इस किरदार को ज्यादा प्रसंग नहीं मिले क्योंकि इसके क़त्ल के इर्दगिर्द ही कहानी घुमती है।

ओजियो खापलांग –  चांग का सबसे टॉप का कमांडर, उसका दायां हाथ और भरोसेमंद आदमी। लेखक ने इस किरदार का शानदार चरित्र-चित्रण किया है।

चंग जुई तोंग – चांग का सेकंड इन कमांड। इसका चरित्र चित्रण एक सिपहसालार के रूप में है।

चिंगीनोसा – लिली की करीबी सहेली। इस किरदार को लेखक महोदय ने अच्छा स्पेस दिया। हालांकि इसका चरित्र चित्रण आरम्भ में कुछ खास नहीं किया गया।

जुत्सई लीना रेंगमा – लिली की एक और सहेली जिसका आगमन आधा उपन्यास खत्म होने के बाद होता है। इसका चरित्र चित्रण भी उतना खास नहीं है जबकि किरदार को अपेक्षा से अधिक कहानी में स्थान दिया गया है।

इन मूल किरदारों के अलावा, लेखक ने कई किरदारों को इसमें इंट्रोड्यूस किया है लेकिन उसके चरित्र चित्रण पर उतनी खास तवज्जो नहीं दी है।

लेखक ने चरित्र-चित्रण में खास तवज्जो अश्विन, चांग और खफलांग को ही दिया है।

किरदारों का चरित्र विकास (Character Growth):-

लेखक महोदय ने अश्विन पंडित के किरदार में विकास किया या ह्रास, यह समझ में नहीं आता है। बेगूसराय का दुर्दांत और दबंग पुलिसिया चांग के सामने रस्सी में बंधा बंदर सा नज़र आता है। हालांकि आगे की कहानी में उसे शेर बनाने की कोशिश यानि पुनः पुराने रूप में लाने की कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं जान पड़ती है।

चांग का जो किरदार लेखक ने आरंभ में गढ़ा उसे पूरे उपन्यास में कायम रखा। इस किरदार के चरित्र में कोई उतार-चढ़ाव नज़र नहीं आता है।

लिली और खापलांग के किरदार में भी आगे की कहानी में कोई विकास नज़र नहीं आता है।

जबकि चिंगीनोसा, लीना और तोंग के किरदार को लेखक महोदय ने आरम्भ में वो तवज्जो नहीं दी जो आगे जाकर कहानी के अनुसार दी।

चिंगीनोसा का किरदार, एक सहेली से इतर, एक अनजान व्यक्ति की हेल्प करने वाली, साइलेंट रूप से रिवेंज लेने वाली एवं प्यार करने वाली लड़की के रूप में उभरता है।

लीना का किरदार भी चंचल एवं मासूम लड़की से डेरिंग लड़की में बदलता है जो अश्विन पंडित की हर मोड़ पर, हर स्थिति में, हेल्प करती नज़र आती है।

तोंग के किरदार में अविश्वसनीय बदलाव नज़र आता है।

संयोग (coincidences) :-

क्राइम फिक्शन कथाओं में संयोगों का कोई स्थान नहीं होता है लेकिन इस कहानी में कुछेक संयोग मुझे नज़र आये हैं:-

  1. चांग के तहखाने को अश्विन द्वारा खोज निकाला जाना एक प्रकार का संयोग ही लगता है।
  2. लिली के कत्ल की मौकाए-वारदात के पास एक क्रॉस वाला लॉकेट मिलता है, जिसका इस्तेमाल इन्वेस्टिगेशन के दौरान अश्विन बिल्कुल नहीं करता है।

व्याकरण की अशुद्धियां (Grammatical Error):-

कथा एवं लघुकथाओं में व्याकरण की अशुद्धियाँ खोजना आसान होता होगा, लेकिन एक क्राइम थ्रिलर उपन्यास में, उसके पेस और फ्लो के कारण, अशुद्धियां निकालना मुश्किल कार्य है। कोई जानबूझकर, लेंस लेकर खोजने निकले तो वह मात्र अशुद्धियां ही खोज पायेगा, पुस्तक को एन्जॉय नहीं कर पायेगा। इस उपन्यास में भी कुछ व्याकरण की अशुद्धियां नज़र आती हैं, लेकिन मैं उन्हें अंडरलाइन नहीं कर पाया।

हास्य (Humor) :-

इस उपन्यास में हास्य संवादों की भरपूर कमी नज़र आती है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि क्राइम फिक्शन उपन्यासों में हास्य हो ही लेकिन जब वास्तविकता के धरातल पर कुछ लिखा जाता है तो जीवन में अचानक ही ऐसा कुछ घटता भी है जिसमें हास्य का समावेश होता है।

मानवीय भावनाएं (Emotion) :-

लिली और अश्विन के बीच की मानवीय भावनाओं को लेखक ने बखूबी चित्रित किया है। वहीं लीना और चिंगीनोसा के इमोशन भी लेखक ने चित्रित किये हैं। लेकिन अश्विन के उन भावनाओं के जरिये लेखक ने पाठकों की भावनाओं को झकझोरने की कोशिश की जिसमें चांग के अत्याचार को देखकर या उसके बारे में किसी से सुनकर वह मूक प्रतिक्रिया करता है। यहाँ यह देखे जाने लायक है कि जब अश्विन बेगूसराय में खुद ऐसे अत्याचार करने, खून-खराबा करने से नहीं चूकता था तो क्योंकर उसे चांग के अत्याचार खलने लगे। ऐसा लगता है कि लिली से शादी के बाद हिंसा के लिए, खासकार बेगुनाहों पर अत्याचार के मामले में, उसके अंदर बदलाव आया जिसका फ़र्क यह पड़ा कि वह चांग के अत्याचारों को बर्दास्त तो करने लगा, लेकिन मन ही मन, क्यूंकि वह अगर चांग के ऐक्ट के खिलाफ कुछ भी बोलता तो शायद जान से जाता। इसके अलावा उसके मन के किसी कोने के अच्छे इंसान ने अंदर ही अंदर ऐसे अत्याचारों के लिए चांग का विरोध करना शुरू कर दिया था – और इस भावना को लेखक महोदय ने बखूबी रूपांकित किया है।

सामाजिक नज़रिया (social aspects) :-

लेखक महोदय पूरे उपन्यास में एक ऐसे समाज का चित्रण करते हैं जहां का हुक्मरान एक ऐसा तानाशाह है, जिसके जूते के नोक के आगे कोई कुछ नहीं है। ऐसे समाज का चित्रण करने में लेखक सफल तो रहे हैं लेकिन उसके विरुद्ध किसी किरदार के द्वारा कोई मुखालफत करने में असफल रहे हैं। जिस अराजकता का चित्रण उपन्यास के आरम्भ में है, उसे अंत तक कायम रखा गया है। प्रत्येक किरदार अपनी जान बचाता नज़र आता है, या मौत को प्यारा होता नज़र आता है, या अपने पर हुए अत्याचार का बदला लेता नज़र आता है। भारत में अमूमन ऐसे कथानकों के अंत में सत्य की विजय होती है असत्य की हार, प्रकाश अँधियारे को दूर भगा देता है, अराजकता को कानून खत्म कर देता है लेकिन ऐसा इस उपन्यास में होता नजर नहीं आता है।

वास्तविकता के करीब (Near to Reality) :-

लेखक महोदय इस मामले में कमजोर लगे। स्थान, क्षेत्र, वेशभूषा, भाषा आदि के विवरण में लेखक महोदय बाजी मार जाते हैं लेकिन कहानी के कई बिंदु ऐसे नज़र आते हैं जो आम पाठकों को अविश्वसनीय लगते हैं। इनके अलावा कहीं भी ऐसा मेहसूस नहीं होता कि कहानी काल्पनिक है लेकिन कहानी पूरा पढ़ने के बाद यह महसूस भी होता है कि पूरी कहानी तो पहले 3 बिंदुओं के इर्दगिर्द थी, अगर अन्य बिंदु ना भी होते तब भी कहानी आगे बढ़ सकती थी।

  1. चांग जैसा तानाशाह और उसकी गुंडागर्दी
  2. उसका किला
  3. सुरंग और तहखाना (यह हिस्सा मुझे किसी तिलस्मी और ऐयारी कथानक जैसा लगता है)
  4. पुलिस सिस्टम का निष्क्रिय दिखाया जाना

रहस्य (Mystery) :-

कहानी में रहस्य का पुट देने के लिए एक कत्ल का एंगल ही है, लेकिन उसमें भी रहस्य वाला वो मजा नहीं जो अमूमन किसी मर्डर-मिस्ट्री में देखने को मिलता है। ‘कातिल कौन’ के अलावा जो रहस्य इस उपन्यास में देखने को मिला वह यह था कि कातिल कत्ल करके उस बंद कमरे से कैसे गायब हुआ। लेकिन बहुत जल्दी ही इस रहस्य से पर्दा उठ जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लेखक महोदय ने एक शानदार थ्रिलर उपन्यास में मर्डर-मिस्ट्री का एक तड़का लगाया जो कि उतना प्रभावित करता नजर नहीं आता।

थ्रिल (Thrill) :-

थ्रिल के मामले में उपन्यास अपने समय से आगे का जाकर निकलता नजर आता है। लेकिन कथानक में वर्तमान के दौर की फ्रेशनेस की कमी नजर आती है। इसके बावजूद भी – गन-फाइट सीक्वेंस, चेज सीक्वेंस – आदि शानदार तरीके से चित्रित किए गए हैं जो पाठक को रोमांच के नए स्तर पर ले जाने में सक्षम नजर आती है। खास कर दो चेज सीक्वेंस – एक जिसमें अश्विन लिली के कत्ल के बाद किले से भागता है और उसके पीछे चांग की फौज लगी होती है – दूसरा जिसमें अश्विन और लीना कोहिमा से दीमापुर के रास्ते में चांग की फौज से टकराते हैं और खुद को बचाने के लिए कार से भागते हैं। ये दोनों ही सीक्वेंस बेहतरीन बन पड़े हैं। इनके अलावा भी कई ऐसे दृश्य हैं जो पाठकों को थ्रिल फ़ील करने में कमी नहीं छोड़ते।

सस्पेंस (Suspense) :-

जिस प्रकार से उपन्यास में रहस्य की कमी है, उसी प्रकार से सस्पेंस की कमी भी है। लेकिन फिर भी लेखक महोदय – काफी सारे सस्पेंस पाठकों के लिए छोड़े – जो कि धीरे-धीरे कहानी बढ़ने के साथ खत्म या कम होते जाते हैं। जैसे कि अश्विन एवं पाठकों का यह सस्पेंस की तहखाने से जाता सुरंग कहाँ जाकर मिलता है, तहखाने में रखा सामान किसका है। कुछ ऐसे ही 4-5 प्रसंग हैं जो सस्पेंस की कमी को पूरा करने की कोशिश करते हैं लेकिन मुझे शायद और अधिक सस्पेंस और रहस्य की उम्मीद थी लेखक साहब से।

तनाव (Tension):-

उपन्यास में तनाव की काफी स्थितियाँ हैं जो कि उपन्यास को पठनीय बनाते हैं। जब पहली बार अश्विन का सामना लिली से दीमापुर रेल्वे स्टेशन पर होता है, तब होने वाली गन – फाइट पाठकों के मन में तनाव की स्थिति लेकर आती है कि क्या होगा। वहीं ऊपर बताए गए चेज सीक्वेंस में भी टेंशन बरकरार रहती है। वहीं किले के अंदर वाय फॉर्मैट के रास्ते पर अश्विन के सोचने की स्थिति और पाठक की स्थिति बराबर सी रहती है।

घड़ी की बजती सुइयों जैसा तनाव (Tension like tickling clock):-

ऐसा दृश्य एक मात्र तब है जब रेंगमा को चांग के दरबार में पेश किया जाता है, जहां अश्विन और तोंग भी मौजूद होता है। हालांकि यह दृश्य फिल्मी लगता है लेकिन बेहतरीन बन पड़ा है।

ट्विस्ट एवं टर्निंग पॉइंट :-

एक थ्रिलर उपन्यास में ट्विस्ट एवं टर्निंग पॉइंट्स, जितने अधिक होते हैं, टेंशन और सस्पेंस उतना बढ़ता है लेकिन इस उपन्यास में ट्विस्टस की बहुत कमी खली। जो नजर आए, आपको बताया देता हूँ –  अश्विन का चिंगीनोसा के घर जाकर हेल्प मांगना, अश्विन को तहखाना मिलना और तोंग के किरदार का अचानक ऊंचा उठ जाना।

फ़्लो ऑफ द स्टोरी :-

कुछ हिस्सों को छोड़ दिया जाए तो स्टोरी का फ़्लो कहानी के अनुरूप है अर्थात जिस प्रकार का फ़्लो थ्रिलर कहानियों में होना चाहिए लगभग वैसा ही है।

पेस ऑफ द स्टोरी :-

कहनी की रफ्तार तेज है और थ्रिलर उपन्यासों सरीखा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लेखक महोदय ने अपने अनुभवों का काफी इस्तेमाल किया और अनावश्यक संवादों और प्रसंगों द्वारा कहानी को स्लो करने की कोशिश नहीं की है।

कॉन्टिन्यूटी ऑफ द स्टोरी:-

फ़्लो एवं पेस की तरह ही कहानी की कॉन्टिन्यूटी भी शानदार है। हालांकि वर्तमान से पूर्वाभास में जाते ही कहानी की कॉन्टिन्यूटी खराब होती है लेकिन लेखक महोदय ने संवादों के जरिए अश्विन के अतीत को दर्शाने के बावजूद कहानी को अतीत में ले जाना ही बेहतर समझा जिससे कॉन्टिन्यूटी में ब्रेक लगता है लेकिन वापिस वर्तमान में आते ही कॉन्टिन्यूटी अंत तक बरकरार रहती है।

डिडक्शन :-

कत्ल का डिडक्शन उतना मुतमुईन नहीं करता क्यूंकि लेखक महोदय कत्ल के मामले में उतने सस्पेंस, मिस्ट्री एवं टेंशन के एलिमेंट्स डाल नहीं पाए क्यूंकि उनका ध्यान उपन्यास को थ्रिलर बनाए रखने पर था।

क्लाइमैक्स :-

कहानी पढ़ने के बाद क्लाइमैक्स की जो उम्मीद पाठक बनाते हैं, उस उम्मीद पर लेखक महोदय क्लाइमैक्स को उतार नहीं पाए हैं। बाकी जब आप किताब पढ़ेंगे तो इस बात को आसानी से समझ पाएंगे।

मेरी आदत है कि जब भी कोई पुस्तक पढ़ता हूँ तो उसमें आए महत्वपूर्ण वाक्य या संवाद जिसमें जीवन की फिलासफी हो, उसे नोट कर लेता हूँ और इस एलीमेंट की कमी मुझे इस उपन्यास बेहद खली।

मैंने ऊपर कहीं लिखा है कि यह उपन्यास मुझे उस तिलिस्मी और ऐयारी की दुनिया की याद दिलाता है, जिसको वर्तमान में लिखा नहीं जाता है। किला, तहखाना और सुरंग आदि आपको उस दुनिया में पहुंचाने से चूकेंगे नहीं और पूरे उपन्यास का थ्रिल आपको किताब अपने हाथ से नीचे रखने से रोके रखेगा।

मेरी नजर में यह उपन्यास कम से कम एक बार तो अवश्य पठनीय है। पाठकगण इस बात को भी समझें कि जिस उपन्यास को पढ़ रहा हूँ, उसमें कुछ एलिमेंट्स की कमी बता रहा हूँ, कुछ खामियाँ बता रहा हूँ तो वही खामियाँ आपको भी खामियाँ लगे। हो सकता है कि इस पुस्तक को पढ़ने का, समझने का, उसमें खो जाने का आपका नजरिया अलग हो। हो सकता है जो मुझे खामियाँ लगी हैं, वो आपको खूबियाँ लगे। इस बात को ध्यान रखिए कि पुस्तकों को पढ़ने के मामले में सुनिए सभी की, लेकिन करिए अपने मन की, अपने दिल की।

आप जब पुस्तक पढ़ रहे हों तब इस समीक्षा को अपने दिमाग में लेकर आने की आवश्यकता नहीं है, जब पूरा पढ़ लें तब इस समीक्षा के साथ अपने पॉइंट ऑफ व्यू को टेली कीजिये, हो सकता है, आपको मेरे विचारों से सहमति न हो।

आप इस उपन्यास को अगर पढ़ना चाहते हैं तो पेपरबैक फॉर्मैट में इसका मूल्य 190 रुपये है, जो कि अभी डिस्काउंट में 140 रुपये में प्राप्त हो रहा है, जबकि ऐमज़ान किन्डल ईबुक में इसका मूल्य मात्र 99 रुपये है।

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आपको उपरोक्त समीक्षा के प्रति अपने सकारात्मक, नकारात्मक एवं आलोचनात्मक विचार कमेन्ट के जरिए मुझसे साझा कर सकते हैं।

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©राजीव रोशन