एविडेंस #१ @ कोर्ट ऑफ़ लॉ

क्राइम इन्वेस्टीगेशन में एविडेंस का महत्वपूर्ण योगदान है। एविडेंस एक ऐसी चीज है जिसके आधार पर न्यायलय किसी केस के लिए निर्णय लेती है। ऐसे एविडेंस कोर्ट के सामने इसलिए पेश किये जाते हैं ताकि वादी एवं प्रतिवादी पक्ष के बीच या दो पार्टी के बीच में बने विवाद के बिंदु को स्थापित किया जाए या नकार दिया जाए। “लॉ ऑफ़ एविडेंस” ‘कानून’ का एक ऐसा महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो न्यायलय को, किसी तथ्य के होने या ना होने के, निष्कर्ष तक पहुँचने में सहायता प्रदान करें। एविडेंस का नियम सच को बाहर लेकर आने के लिए बहुत जरूरी है और प्रत्येक न्यायलय को इस नियम पर टिके रहना भी चाहिए। मूलतः तो एविडेंस के नियम की जरूरत, उचित और अनुचित तथ्यों के बीच एक रेखा खींचने के लिए किया जाता है।

 

भारत में जिस ‘एविडेंस एक्ट’ का आज तक चलन चल रहा है, वो ब्रिटिश राज में, सन १८७२ में बना था जिसे हम ‘इंडियन एविडेंस एक्ट-१८७२’ के नाम से जानते हैं। ‘इंडियन एविडेंस एक्ट -१८७२’ के अंतर्गत निम्न प्रकार के एविडेंस आते हैं:-

 

१)ओरल एविडेंस (मौखिक गवाही) – ‘इंडियन एविडेंस एक्ट-१८७२’ के सेक्शन ६० के तहत ‘मौखिक गवाही’ का वर्णन मिलता है। ‘मौखिक गवाही’ या ओरल एविडेंस वह एविडेंस होता है जो किसी गवाह द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखा या सुना गया हो और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कहा एवं सुना गया हो। वो सभी बयान जो कोर्ट द्वारा अनुमति-प्राप्त हो या कोर्ट में न्याय की देवी के सामने, गवाह द्वारा दिया गया बयान जो तथ्यों के सत्य को उजागर करता हो, ओरल एविडेंस कहलाता है। यह एविडेंस हमेशा डायरेक्ट होना चाहिए, अर्थात प्रत्यक्ष होना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि गवाही मौखिक रूप में ही दी जाए, अगर कोई व्यक्ति गूंगा है तो वह साइन लैंग्वेज के जरिये अपना बयान दर्ज करा सकता है वहीँ अगर कोई व्यक्ति बोलने में असमर्थ है तो वह लिखकर अपना बयान दर्ज करा सकता है – ‘कोर्ट ऑफ़ लॉ’ में ‘मौखिक गवाही’ के रूप में ये मान्य हैं।

 

२) डाक्यूमेंट्री एविडेंस (दस्तावेजी साक्ष्य) – इसे ‘इंडियन एविडेंस एक्ट’ के सेक्शन ३ में परिभाषित किया गया है। किसी केस के दौरान जो भी दस्तावेज न्यायलय के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं, वे डाक्यूमेंट्री एविडेंस कहलाते हैं। इस एक्ट में डॉक्यूमेंट का अर्थ है, कोई भी विषय जिसे किसी चीज पर, पत्र, फिगर या चिन्हों के जरिये उकेरा गया हो।

 

३) प्राइमरी एविडेंस – सेक्शन ६२ में इस इसको परिभाषित किया गया है। साक्ष्यों के मामले में, इस साक्ष्य को सबसे ऊपर रखा जाता है। ये वो साक्ष्य होते हैं, जो कोर्ट ऑफ़ लॉ में, कानून के अनुसार, पहले स्थान पर, मान्य एवं स्वीकार्य होते हैं। ये वो साक्ष्य होते हैं, जो कि किसी विवादित तथ्य में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं और दस्तावेजी साक्ष्य के जरिये इसे न्यायलय में उसे साबित भी कर देते हैं। कोई भी डॉक्यूमेंट जो ओरिजिनल रूप में कोर्ट में पेश किया जाए वह प्राइमरी एविडेंस के अंतर्गत आ जाता है।

 

४) सेकेंडरी एविडेंस – सेक्शन ६३ में इसे परिभाषित किया गया है। यह वे साक्ष्य होते हैं, जिनके बारे में, ‘कोर्ट ऑफ़ लॉ’ में तब विचारा जाता है जब प्राइमरी एविडेंस की अनुपस्थिति हो। इसलिए इसे सेकेंडरी एविडेंस कहा जाता है। सेकेंडरी एविडेंस, प्राइमरी एविडेंस का कॉपी हो सकता है, जो कि ओरिजिनल के स्थान पर दिया गया हो। किसी भी डॉक्यूमेंट का फोटोकॉपी सेकेंडरी एविडेंस होता है वहीँ फोटोग्राफ भी सेकेंडरी एविडेंस के अंतर्गत आता है। मुख्यतः न्यायलय, प्राइमरी एविडेंस को ज्यादा प्रेफर करते हैं, पर कभी-कभी सेकेंडरी एविडेंस का भी सहारा लेना पड़ता है।

 

५) रियल एविडेंस (वास्तविक साक्ष्य) – वास्तविक साक्ष्य वे साक्ष्य होते हैं जो वास्तविक एवं भौतिक रूप में मौजूद हों। वास्तविक साक्ष्य या तथ्य का सबूत, कोर्ट के सामने किसी भौतिक वस्तु का निरिक्षण करके, पेश किया जाता है, न कि किसी गवाह या दस्तावेज से मिली जानकारी के द्वारा।

 

६) हिअरसे एविडेंस – यह वह एविडेंस होता है जिसमे गवाह ने न तो खुद देखा होता होता है और न ही कुछ सुना होता है, जबकि ये वो होते हैं जो किसी नया व्यक्ति के द्वारा उसके जानकारी में आते हैं। एविडेंस के मामले में यह बहुत कमजोर साक्ष्य होता है।

 

७) जुडिशल एविडेंस – ये वे साक्ष्य होते हैं जो कि कोर्ट में किसी मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया हो। जैसे अपराधी द्वारा, कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने, इकबालिया बयान।

 

८) नॉन-जुडिशल एविडेंस – कोई भी इकबालिया बयान जो कि कोर्ट से बाहर किसी अन्य व्यक्ति से सामने दिया गया हो, उसे नॉन-जुडिशल एविडेंस कहा जाता है।

 

९) डायरेक्ट एविडेंस – डायरेक्ट एविडेंस वे साक्ष्य होते हैं जो किसी तथ्य को पूरी तरह से स्थापित कर दें। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण – गवाह द्वारा दिया गया बयान है।

 

१०) इन-डायरेक्ट या परिस्थितिजन्य साक्ष्य – परिस्थितिजन्य साक्ष्य वे साक्ष्य होते हैं जिसमे विवाद में, दुसरे तथ्य को कोर्ट के सामने रखकर,  किसी अन्य तथ्य को साबित करने की कोशिश की जाती है। परिस्थितिजन्य साक्ष्य कभी भी परफेक्ट सबूत नहीं होते, ये बस क्राइम सीन पर घटने वाली घटना के बारे में बताता है। परिस्थितिजन्य साक्ष्य असंबंधित तथ्य होते हैं, जिन्हें जब एक धागे में पिरोया जाता है तो कुछ परिणाम निकल कर आते हैं जिनका इस्तेमाल कोर्ट ऑफ़ लॉ में किया जाता है।